न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
अश्मित सिन्हा / पटना: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार सरकार से पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर सवाल पूछा। कोर्ट ने कहा कि दीपक प्रकाश किस संवैधानिक आधार पर छह महीने से अधिक समय तक विधायक या विधान परिषद सदस्य बने बिना मंत्री पद पर बने हुए हैं। अदालत ने राज्य सरकार से इस मामले में स्पष्ट जवाब मांगा है। यह मामला अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
याचिकाकर्ता का सवाल
मिली जानकारी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं बने हैं। बावजूद इसके वे मंत्री पद पर बने हुए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह संवैधानिक व्याख्या से संबंधित मामला है और राज्य सरकार को इसका आधार स्पष्ट करना होगा।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार की तरफ से अदालत को बताया गया कि मामला पहले से 27 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाने या पहले सुनने का फैसला अदालत के उपर छोड़ दिया गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस याचिका पर अगले सप्ताह मंगलवार को सुनवाई होगी।
ये है पूरा मामला
यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एवं व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह ने दर्ज कराया है। याचिका में दीपक प्रकाश की दोबारा मंत्री नियुक्ति को संविधान के अनुच्छेद 164(4) के खिलाफ बताया गया है। संविधान के अनुसार, कोई गैर-विधायक ज्यादा से ज्यादा छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है और इस अवधि के अंदर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी होता है।
20 नवंबर 2025 को मंत्री बने थे दीपक
याचिका के मुताबिक, दीपक प्रकाश 20 नवंबर 2025 को पहली बार मंत्री बनाए गए थे, जबकि वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। बाद में पूर्व सीएम नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद मंत्रिपरिषद भंग हो गई। इसके बाद 7 मई को सीएम सम्राट के नेतृत्व में बनी नई सरकार में दीपक प्रकाश को फिर से पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया। तब भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह संविधान के प्रावधानों को दरकिनार कर छह महीने की सीमा बढ़ाने का प्रयास है।
