‘हमारे लिए वह मर चुकी है’ घर से भागी बेटी ने मां-बाप को ठुकराया, कटिहार में पिता ने पुतले का किया दाह संस्कार
न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क(कुंदन सिंह, कटिहार) बिहार के कटिहार जिले के कोढ़ा प्रखंड अंतर्गत चंदवा पंचायत के खुदना गांव से एक बेहद हैरान और भावुक कर देने वाली सामाजिक घटना सामने आई है। यहाँ एक मजबूर पिता ने समाज और ग्रामीणों की मौजूदगी में अपनी ही जीवित बेटी का पूरे हिंदू रीति-रिवाज और विधि-विधान के साथ प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार कर दिया। बेटी के इस तरह ‘जीते जी मर जाने’ के फैसले के बाद से पूरे इलाके में इस घटना की चर्चा जोरों पर है।
लापता होने के बाद जब मिली बेटी, तो माता-पिता को ही पहचानने से मुकर गई
मिली जानकारी के अनुसार, खुदना गांव के मुनचुन पासवान की बेटी कुछ समय पहले अचानक घर छोड़कर लापता हो गई थी। परेशान परिजनों ने उसकी काफी खोजबीन की और रौतारा थाने में उसकी गुमशुदगी का मामला भी दर्ज कराया। काफी प्रयासों के बाद जब पुलिस ने लड़की को बरामद किया, तो कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने माता-पिता के पैरों तले से जमीन खिसका दी। परिजनों का आरोप है कि बरामद होने के बाद लड़की ने अपने ही सगे माता-पिता और परिवार को पहचानने से साफ इनकार कर दिया।
पुतले की बनाई अर्थी, पूरे गांव में निकाली अंतिम यात्रा
बेटी के इस बर्ताव से आहत और टूट चुके परिवार ने समाज के सामने उससे सारे रिश्ते हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने का कड़ा फैसला लिया। परिवार वालों ने लड़की के नाम का एक पुतला (प्रतीकात्मक शव) तैयार किया। इसके बाद बकायदा बांस की अर्थी बनाई गई, जिस पर पुतले को लिटाकर पूरे गांव में गाजे-बाजे और नम आंखों के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई।
“जिसने हमें ठुकराया, वह हमारे लिए मर चुकी”— दादा और पिता का छलका दर्द
शमशान घाट ले जाकर हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार पुतले का दाह संस्कार किया गया। इस दौरान लड़की के पिता मुनचुन पासवान, दादा राम प्रकाश पासवान समेत पूरे परिवार की आंखें नम थीं।”जिस दिन से बेटी घर छोड़कर गई और पुलिस के सामने हमें पहचानने से इनकार कर दिया, उसी दिन हमारे लिए उसका अस्तित्व खत्म हो गया। जो अपनी कोख और परवरिश को भूल जाए, वह हमारे लिए मर चुकी है। अब उससे हमारा जनम-जनम का नाता टूट गया।” — मुनचुन पासवान, बेबस पिता
श्राद्ध कार्यक्रम में उमड़े सैकड़ों ग्रामीण, गांव में हो रही तरह-तरह की चर्चाएं
इस अजीबोगरीब और कड़े फैसले की खबर आग की तरह आसपास के गांवों में फैल गई। प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार और उसके बाद आयोजित किए गए श्राद्ध कार्यक्रम में सांत्वना देने के लिए सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण मुनचुन पासवान के घर पहुंचे। गांव के प्रबुद्ध लोग और युवा इस घटना को लेकर तरह-तरह की सामाजिक और नैतिक चर्चाएं कर रहे हैं। कुछ लोग इसे परिवार का आत्मसम्मान कह रहे हैं, तो कुछ इसे एक पिता की लाचारी।
