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जन्म से दोनों हाथ नहीं, हौसला आसमान से ऊंचा! पैरों से पढ़ाई कर शिक्षिका बनना चाहती है लक्ष्मी..


न्यूज 11 भारत/पटना डेस्क
कुंदन सिंह / कटिहार:
कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड से सामने आई लक्ष्मी की कहानी इस सवाल का एक ऐसा जवाब है, जिसे देखकर हर किसी की आंखें नम और दिल जज्बे से भर जाएगा। तस्वीरें हसनगंज प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय भतौरिया की हैं, जहां कक्षा चार में पढ़ने वाली छात्रा लक्ष्मी जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग है, उसके दोनों हाथ नहीं हैं लेकिन लक्ष्मी ने अपनी मजबूरी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। वह अपने पैरों से अक्षर लिखकर अपनी तकदीर बदलने की कोशिश कर रही है।

लक्ष्मी का सपना है, खूब पढ़ना, आगे बढ़ना और बड़ी होकर शिक्षिका बनना है। जिंदगी ने लक्ष्मी को जन्म से ही बड़ी चुनौती दी, लेकिन उसके हौसले के आगे मुश्किलें भी छोटी नजर आती हैं। और इस हौसले के पीछे उसके माता-पिता की ममता और संघर्ष भी काबिले-तारीफ है। परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है। माता-पिता मजदूरी कर अपने बच्चों की परवरिश करते हैं। खुद अनपढ़ होने के बावजूद वे अपनी बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देना चाहते। 

बताया जाता है, कि लक्ष्मी के जन्म के बाद कुछ लोगों ने उसके माता-पिता को बच्ची को छोड़ देने तक की सलाह दी थी। लेकिन मां-बाप ने समाज की बात नहीं मानी। उन्होंने अपनी बेटी को बोझ नहीं, लक्ष्मी समझकर प्यार से उसका नाम रखा—लक्ष्मी। आज यही माता-पिता रोजाना अपनी बच्ची को सुदूर इलाके से विद्यालय तक लाते हैं। ताकि अक्षर ज्ञान के सहारे उनकी बेटी अपनी जिंदगी की दिशा बदल सके। वहीं विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं का सहयोग भी तारीफ के काबिल है। लक्ष्मी को पढ़ाई में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए शिक्षक हमेशा उसके विशेष सहयोग के लिए तत्पर रहते हैं।

दो हाथ नहीं हैं… लेकिन हौसला दो हाथों से भी ज्यादा है। पैरों से लिखी जा रही लक्ष्मी की यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों और बच्चियों के लिए एक बड़ा संदेश है, जो छोटी-छोटी परेशानियों या बहानों की वजह से शिक्षा से दूर हो जाते हैं। लक्ष्मी हमें सिखा रही है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो तो इंसान अपनी तकदीर खुद लिख सकता है। 

आज जरूरत है कि लक्ष्मी जैसे बच्चों का हाथ समाज थामे और सरकार भी ऐसे दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए हर संभव सहयोग करे। लक्ष्मी के हाथ नहीं हैं… मगर उसके सपनों के पंख हैं। वह पढ़ना चाहती है, आगे बढ़ना चाहती है और शिक्षिका बनकर दूसरों का भविष्य संवारना चाहती है। लक्ष्मी के इस जज्बे को दिल से सलाम! और समाज से बस एक सवाल ये है कि क्या हम लक्ष्मी के इस सपने को उड़ान देने में उसका साथ देंगे??? 
 



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