न्यूज 11 भारत / पटना डेस्क: बिहार में विकास कार्यों और सरकारी योजनाओं को समय पर पूरा करने की दिशा में राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब सूबे में स्कूल, अस्पताल, सड़क या किसी भी सरकारी परियोजना के लिए भूमि आवंटन (Land Allocation) की प्रक्रिया में महीनों का समय बर्बाद नहीं होगा। सरकार ने प्रशासनिक लेटलतीफी को खत्म करने के लिए जमीन ट्रांसफर से जुड़े नियमों में अमूल-चूल बदलाव करते हुए जिलाधिकारियों (DM) और प्रमंडलीय आयुक्तों (Commissioners) के वित्तीय व प्रशासनिक अधिकारों का दायरा काफी बढ़ा दिया है।
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इस फैसले के बाद अब जमीन आवंटन की छोटी-छोटी फाइलों को मंजूरी के लिए राजधानी पटना स्थित मुख्यालय भेजने की मजबूरी खत्म हो जाएगी।
पुरानी व्यवस्था में बदल गया नियम, डीएम की ताकत हुई 3 गुना से ज्यादा
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, पहले की व्यवस्था बेहद पेचीदा थी। पूर्व के नियमों के तहत जिलाधिकारियों को केवल 3 एकड़ तक की ही गैर-मजरूआ आम या सरकारी जमीन किसी दूसरे विभाग को स्थानांतरित करने का अधिकार था। वहीं, 3 से 5 एकड़ तक की भूमि के ट्रांसफर के लिए प्रमंडलीय आयुक्त की मंजूरी लेनी पड़ती थी।
हाल ही में जब विभाग ने समीक्षा की, तो सामने आया कि इस सीमित अधिकार के कारण मामूली प्रोजेक्ट्स की फाइलें भी महीनों तक सचिवालय में धूल फांकती रहती थीं। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार ने अब सीधे 10 एकड़ तक की सरकारी जमीन को किसी भी विभाग को मुफ्त या स्थायी रूप से सौंपने का पूरा अधिकार जिलाधिकारियों को दे दिया है।
प्रमंडलीय आयुक्त अब 20 एकड़ तक की फाइलों पर लगाएंगे मुहर
संशोधित नियमों के मुताबिक, यदि किसी सरकारी योजना के लिए 10 एकड़ से अधिक और 20 एकड़ तक की भूमि की आवश्यकता होती है, तो उसका फैसला प्रमंडलीय आयुक्त (कमिश्नर) के स्तर पर ही फाइनल कर दिया जाएगा। हालांकि, यदि कोई मेगा प्रोजेक्ट है जिसके लिए 20 एकड़ से भी ज्यादा जमीन की दरकार होगी, तो ऐसी फाइलों को अंतिम मंजूरी के लिए राज्य कैबिनेट (मंत्रिमंडल) के पास भेजा जाएगा।
डिजिटल साइन्ड लैंड रिकॉर्ड ही होंगे मान्य, फर्जीवाड़े पर लगेगी लगाम
जमीन आवंटन के विकेंद्रीकरण के साथ-साथ सरकार ने भू-राजस्व प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए एक और कड़ा फैसला लिया है। विभाग ने साफ कर दिया है कि अब सरकारी या आम जनता से जुड़े किसी भी कार्य के लिए केवल डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित (Digitally Signed) लैंड रिकॉर्ड ही वैध माने जाएंगे। बिना डिजिटल सिग्नेचर वाले पुराने, साधारण या हस्तलिखित दस्तावेजों को पूरी तरह अमान्य कर दिया गया है। इस कदम से भूमि संबंधी कार्यों में फर्जीवाड़ा रुकेगा और काम में पारदर्शिता आएगी।
