न्यूज 11 भारत / बिहार डेस्क
पटना – बिहार की सांस्कृतिक विरासत को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य की तीन विशिष्ट पारंपरिक कलाओं—नालंदा की बावन बूटी वस्त्रकला, गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग—को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह सम्मान इन उत्पादों की विशिष्टता और ऐतिहासिक महत्व को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणित करता है। जीआई टैग मिलने से इन कलाओं की मौलिक पहचान सुरक्षित रहेगी और इनके नाम पर तैयार किए जाने वाले नकली उत्पादों पर प्रभावी रोक लग सकेगी। लंबे समय से स्थानीय स्तर पर प्रसिद्ध ये कलाएं अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगी।
हाइलाइट्स –
- बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग।
- नालंदा की बावन बूटी साड़ी-फैब्रिक को मिली विशेष पहचान।
- गया की पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट को मिला भौगोलिक संकेतक दर्जा।
- भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को भी जीआई टैग से सम्मानित किया गया।
- नाबार्ड और बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों से मिली सफलता।
- कारीगरों, बुनकरों और कलाकारों को आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद।
- नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मिलेगी मदद।
- वैश्विक बाजार में बिहार की पारंपरिक कलाओं को मिलेगा नया अवसर।
कारीगरों और बुनकरों के लिए नए अवसर
इस उपलब्धि के पीछे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) तथा बिहार सरकार के संयुक्त प्रयासों की बड़ी भूमिका रही है। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद इन उत्पादों को यह दर्जा प्राप्त हुआ। नालंदा की बावन बूटी साड़ी अपनी सूक्ष्म बुनाई और आकर्षक बूटी डिजाइनों के लिए जानी जाती है, जो बिहार की समृद्ध हस्तकरघा परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। वहीं गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला में पत्थरों पर बारीक नक्काशी कर उत्कृष्ट कलाकृतियां तैयार की जाती हैं, जिनका संबंध राज्य की ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर से जुड़ा हुआ है। भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग ग्रामीण जीवन, लोक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली एक विशिष्ट लोक कला है। जीआई टैग मिलने से इन कलाओं से जुड़े हजारों कलाकारों, शिल्पकारों और बुनकरों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी।
परंपरा के संरक्षण के साथ आर्थिक लाभ की उम्मीद
जीआई टैग केवल एक पहचान चिह्न नहीं, बल्कि किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत की सुरक्षा का माध्यम भी है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि संबंधित उत्पाद उसी क्षेत्र की परंपरागत तकनीकों और कौशल के आधार पर तैयार किए जाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मान्यता से बिहार की लोक कलाओं और हस्तशिल्प को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी। साथ ही, स्थानीय कारीगरों की आय में वृद्धि, रोजगार के अवसरों का विस्तार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने की संभावना है। यह उपलब्धि न केवल बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान दिलाती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग भी प्रशस्त करती है।
